*किस सोच में बैठी है*
किस सोच में बैठी है, अब इतना भी न विचार कर
तू भी वो ही कर जो करते है सब, थक हार कर,
तू अबला नहीं एक शक्ति है दुस्मन के लिए विपत्ति है
अब तू ही खुद, खुद से खुद का उद्धार कर ।

इन्तेजार तुझे अब किसका है, आएगा न अब कोई ग्वाला
न नटखट वो न माखनचोर और न ही कोई नन्दलाला
अब खुद ही तुझे बचाना ही अपने दामन को दाग से
है खौफ तुझे किस बात का जीना उनका दुसवार कर ।

है बैठे जो इस ताक में, तेरी अस्मत मिले कब ख़ाक में
तेरा न कोई अब सानी है तू ही दुर्गा तू भवानी है
कोई आन्च नहीं लगने पाए कोई दामन न छूने पाए
अब तू ही उन दुष्टो का अपने हाथो सन्हार कर।
किस सोच में तू.........

दो आंसू लेकर वो सब आएंगे, जिनके भरोसे तू बैठी है
तू अच्छी है तू भोली है पर उनकी निगाहें ऐठी है
अब कृष्ण नहीं है यहाँ कोई सब दुस्सासन कुछ भीष्म है
यह दुनिया फिर से कुरु सभा बनी है कुछ भी न मिलेगा चित्कार कर ।



vishalyadavghazipuriya

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